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Aggressive Politics: राहुल से क्यों घबराता है संघ परिवार?

infopost September 2, 2024
Aggressive Politics

Aggressive Politics: राहुल गांधी की आक्रामक राजनीति सिर्फ मोदी और अमित शाह को परेशान नहीं कर रही है। उससे आरएसएस का दो शीर्ष नेतृत्व भी परेशान है। ये दो लोग हैं आरएसएस चीफ मोहन भागवत और महासचिव दत्तात्रेय होशबोले। कुल मिला कर सर्वोच्च कुर्सी पर बैठे लोगों में घबराहट है। ऐसा क्यों, समझते हैं।

Aggressive Politics: केरल में आरएसएस और बीजेपी की मैराथन बैठक

इंफोपोस्ट डेस्क

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Aggressive Politics: केरल के पलाकक्ष शहर में आरएसएस और बीजेपी की मैराथन बैठक चल रही है। इस बैठक में मोहन भागवत, दत्तात्रेय होशबोले, भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा और संगठन के महामंत्री बीएल संतोष मौजूद हैं। इस महाबैठक में एक ही व्यक्ति की चर्चा हो रही है और है राहुल गांधी। चर्चा की जा रही है कि राहुल के राजनीतिक एजेंडे की काट कैसे की जाए। कल तक जो आरएसएस और बीजेपी वाले राहुल गांधी को पप्पू कहते थे, आज उसी पप्मू से सब के सब घबराए हुए हैं।

दरअसल, आरएसएस और बीजेपी की बैठकें आमतौर पर सीक्रेट होती हैं। वहां कैमरा ले जाने की अनुमति नहीं होती है। वहां जो डिस्कसन होता है, बंद कमरों में होता है। वास्तव में आरएसएस और बीजेपी को यह चिंता है कि राहुल और अखिलेश ने जिस तरह इस लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश को उनके हाथ से छीना है, भाजपा का दलित, पिछड़ा और अति पिछड़ा वोटबैंक खिसक चुका है।

राहुल गांधी ने जिस तरह राजस्थान, हरियाणा और महाराष्ट्र में भाजपा को चुनौती दी है उससे आरएसएस को लगता है कि राहुल का एजेंडा जारी रहा और मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और बिहार भी लपेटे में आ गया तो फिर आगे क्या होगा? 2025 और उसके बाद क्या होगा? चिंता की लकीरें गहराती जा रही हैं।

सीक्रेट मीटिंग के और भी हैं गहरे रहस्य

Aggressive Politics: इस सीक्रेट मीटिंग के और भी कई गहरे राज हैं। राहुल गांधी जो जातिगत जनगणना कराना चाहते हैं और आरक्षण के दायरे को बढ़ाना चाहते हैं, उसकी काट आरएसएस नहीं ढूंढ पा रहा है। क्योंकि इन मुद्दों पर आरएसएस का कभी स्पष्ट एजेंडा नहीं रहा है। और इसी सिलसिले में मोदी और शाह का भी जिक्र हो रहा है। क्योंकि मोदी ने अयोध्या में राम मंदिर के मुद्दे को जिस तरह से शीर्ष पर पहुंचाया और भव्य मंदिर की इवेंट के जरिये यह संदेश देने की कोशिश की कि वह उत्तर प्रदेश को तो जीतेंगे ही, पूरा का पूरा हिंदी हार्टलैंड भी जीत लेंगे। लेकिन हुआ उसका उलटा।

तभी तो आरएसएस को लग रहा है कि इस लोकसभा चुनाव में मोदी का हर हथकंडा फेल हो गया। राहुल गांधी और अखिलेश यादव ने न सिर्फ कमंडल की राजनीति को पीछे धकेला, बल्कि भाजपा के हिंदू वोटबैंक में भी सेंध लगा दी। यहीं पर आरएसएस का एक और आब्जर्वेशन है कि मोदी का जो ब्रांड है, वह काम नहीं कर पा रहा है। इसलिए अब मोदी में चुनावी जीत हासिल करने की कूबत नहीं रह गई है। वर्तमान मोदी 2014 और 2019 वाले मोदी नहीं रह गए हैं।

क्या चार राज्यों के विधानसभा चुनाव में हार रही है बीजेपी?

अब आरएसएस की लीडरशिप राहुल गांधी को गंभीरता से ले रही है और राहुल गांधी की कास्ट सेंसस या आरक्षण की राजनीति को एक चुनौती मान रही है तो क्या चार राज्यों जम्मू कश्मीर, हरियाणा, छत्तीसगढ़ और महाराष्ट्र के विधानसभा चुनावों में बीजेपी हार रही है? आरएसएस को भी लग रहा है कि इन चार राज्यों में बीजेपी का विजय रथ फंसा हुआ है। और अगर रथ फंसा हुआ है, जिसके नतीजे नवंबर में आने हैं। अगर नवंबर आते आते चारों राज्यों में मोदी जी फेल हो गए तो क्या मोदी के नेतृत्व को लेकर आरएसएस नेतृत्व पुनर्विचार कर सकता है?

जो सियासत मोदी के इर्दगिर्द घूम रही थी और मोदी जी ही सारा एजेंडा सेट कर रहे थे, आज स्थितियां बदल चुकी हैं। आज एजेंडा राहुल गांधी सेट कर रहे हैं। अब बीजेपी या तो राहुल गांधी के सवालों का जवाब देती है या उनके मुद्दे को लागू ही कर देती है। क्योंकि बीजेपी अब राहुल गांधी को इग्नोर करने की स्थिति में नहीं है। बड़ा सवाल है कि राजनीति के इस शिफ्ट के बाद आगे क्या होने जा रहा है? राजनीति की दशा और दिशा पर आखिर विशेषज्ञ क्या सोचते हैं?

मोहन भागवत की नाराजगी का आलम

Aggressive Politics: वरिष्ठ पत्रकार उमाकांत लखेड़ा का कहना है कि मोहन भागवत की नाराजगी का आलम यह है कि पानी सिर से गुजर चुका है। लेकिन मोहन भागवत तो एक व्यक्ति हैं जो आरएसएस को लीड कर रहे हैं। उनकी पूरी टीम है, जिससे वह फीडबैक लेते हैं। वह इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि मोदी जी के दिन पूरे हो चुके हैं। आरएसएस की मुख्य चिंता चार राज्यों के विधानसभा चुनाव को लेकर है। क्योंकि आरएसएस का फीडबैक यह है कि भाजपा चारों राज्यों के विधानसभा चुनाव बुरी तरह हार रही है। इसलिए आरएसएस को भविष्य की चिंता है। क्योंकि ये तो चले जाएंगे। फिर भाजपा का क्या होगा? इसलिए अगर भाजपा चारों राज्यों में चुनाव हारती है तो मोदी को हटाने का आरएसएस का काम आसान हो जाएगा।

प्रोफेसर रविकांत कहते हैं कि दलित, पिछड़ा, अतिपिछड़ा और अपर ओबीसी वोटबैंक भाजपा के हाथ से निकल चुका है। अपर ओबीसी में जाट, यादव, कुर्मी और गूजर आते हैं। ये ओबीसी की दबंग और मजबूत जातियां हैं जो पहले बीजेपी के साथ असोसिएट थीं। और अति पिछड़ा वोटबैंक तो बड़े पैमाने पर निकल चुका है। यहां तक कि इन जातियों का 70 से 80 फीसदी वोटबैंक भाजपा के हाथों से फिसल चुका है। क्योंकि राहुल गांधी की संविधान बचाने की मुहिम का असर सीधे दलितों के मानस पर पड़ रहा है। संविधान के प्रतीक के तौर पर उन्हें डॉक्टर भीमराव अंबेडकर दिखाई दे रहे हैं। इसलिए संविधान बचाने के राहुल गांधी के एजेंडे ने दलितों को भाजपा के खेमे से निकाल कर इंडिया के साथ खड़ा कर दिया है।

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