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Corona Havoc: सत्ता के चक्कर में राष्ट्रवाद के सूत्रधार

May 6, 2021
Corona Havoc

Corona Havoc: देश के लोगों को राष्ट्रवाद सिखाने वाले नेताओं को आज कोरोना संकट की कम, सत्ता की चिंता कहीं ज्यादा है। ऐसे में यह सवाल नए संदर्भों के साथ उठ रहा है कि कौन देशभक्त है और कौन देशद्रोही?

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Corona Havoc: आफत में तो बेचारा गरीब, संसाधन वाले तो बन गए हैं खुदगर्ज

चरण सिंह राजपूत


Corona Havoc: देश में विभिन्न परेशानियों के साथ ही आपदाओं को झेलना आम आदमी की नियति बन गई है। वह बात दूसरी है कि ये आपदाएं प्राकृतिक हों या फिर मानव निर्मित। इसे देश की विडंबना ही कहेंगे कि राष्ट्रवाद के सबसे बड़े ठेकेदार आपदाओं के समय अपनी जिम्मेदारियों व देश से भागते नजर आते हैं। ये ही लोग देश के संसाधनों पर कुंडली मारे बैठे हैं।

देश के अधिकतर प्रभावशाली लोगों ने दूसरे देशों की नागरिकता ग्रहण कर रखी है। मतलब, यदि देश में कोई बड़ी दिक्कत हो तो विदेश भाग जाएं। कोरोना काल में काल के मुंह में समा रहे लोगों के परिजनों की हालत देखकर अब कहना गलत न होगा कि देश में अब निर्णय होना चाहिए कि देश के साथ कौन खड़ा है और कौन नहीं।

जिन्हें है सिर्फ अपनी परवाह

जो लोग कोरोना कहर में विभिन्न परेशानियों के बीच भी देश के साथ खड़े हैं ये लोग देशभक्त हैं या फिर जो लोग अपनी जिम्मेदारियों से बचकर छुप गये हैं या फिर विदेश भाग गये हैं, वे देशभक्त हैं। देखने में आ रहा है कि देश के संसाधनों पर कुंडली जमाए बैठे अधिकतर लोग देश और जनता की परवाह न करते हुए अपनी और अपने परिवार की जान बचाने में लगे हैं।

चाहे इसे मजबूरी कहें या फिर संस्कार, यदि थोड़ी बहुत देशभक्ति बची है तो वह आम आदमी में ही है। बाकी सब दिखावा है। देशभक्ति के नाम जो राजनीतिक दल और प्रभावशाली लोग देश के संसाधनों का मजा लूट रहे हैं, वे तो जरूरत के अनुसार अपनी जिम्मेदारी से बचते नजर आते हैं। इनमें से काफी लोग तो देश ही छोड़ देते हैं।

जनता से ज्यादा चिंता सत्ता और एशोआराम की

कोरोना कहर की दूसरी लहर में सब कुछ सामने आने लगा है। राष्ट्रवाद का सबसे अधिक ढिंढोरा पीटने वाले प्रधनामंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह के एक साल में कोरोना से निपटने के लिए कारगर कदम न उठाने और जलती लासों के बीच प. बंगाल में सत्ता के लिए चुनाव प्रचार में डटे रहने से साबित हो गया कि उनको जनता से ज्यादा चिंता सत्ता और अपने एशोआराम की है। राष्ट्रवादी होने की नोटंकी करने वाले सेलेब्रिटी इस कोरोना काल में कहां हैं?

कहां हैं अमिताभ बच्चन, कहां हैं अनुपम खेर, कहां हैं अक्षय कुमार? कहां विभिन्न राजनीतिक दलों से जनप्रतिनिधि बैठे अभिनेता और अभिनेत्रियां? कहां हैं देश के पूंजीपति? कहां हैं अडानी और अंबानी? देश के लोगों की जान बचाने का ठेका लेने वाले सीरम इंस्टीट्यूट के अदार पूनावाला यह कहकर भारत छोड़कर लंदन चले गए कि उनकी जान को खतरा है।

अंबानी का पूरा परिवार विदेश चला गया

खबर यह भी है कि अंबानी का पूरा परिवार भारत छोड़कर विदेश चला गया है। यह वह परिवार है जिस पर मोदी सरकार पूरी तरह से मेहरबान रही है। गरीब आदमी आक्सीजन की कमी से दम तोड़ दे रहा है और काफी लोग 40-40 हजार का आक्सीजन सिलेंडर खरीदकर अपने घरों में रख रहे हैं। महंगा मेडिकल स्टाफ अपने स्वास्थ्य के लिए अपने घरों में लगाया जा रहा है।

देश में ऐसे बहुत से लोग हैं जो या तो विदेश चले गये हैं या फिर अपने ही देश में पर्वतीय इलाकों मे डेरा जमा लिया है। गरीब आदमी जो अपने गांव चला जाता तो इस बार राजनीतिक दलों ने सत्ता की ललक के लिए गांवों में भी कोरोना फैला दिया है।

मतलब गरीब आदमी को मरने के लिए छोड़ दिया गया है। सरकारी अस्पतालों में बेड नहीं हैं। और निजी अस्पतालों में लाखों का बिल। आखिरकार गरीब आदमी जाए तो जाए कहां? यदि उसे कोरोना हो जाए तो श्मशान जाने के अलावा उसके पास कोई रास्ता नहीं बच पा रहा है।

आपदा आम आदमी के लिए ज्यादा नुकसानदायक

कोई भी आपदा, कोई भी समस्या आम आदमी के लिए ज्यादा नुकसानदाायक होती है। संपन्न और प्रभावशाली लोग तो बचने का कोई न कोई रास्ता निकाल ही ले रहे हैं। टीवी चैनलों पर दिन रात विभिन्न विज्ञापनों के माध्यमों के अलावा कई डाक्टर व एंकर भी कहते सुने जाते हैं कि यदि बुखार है तो अलग कमरे में अपने को आइसोलेट कर लें।

लेकिन गांवों में तो कुछ खुले-खुले घर हो सकते हैं पर शहरों की स्थिति तो यह है कि 90 फीसद लोग एक या दो कमरों के घर में रहते हैं। वे लोग कहां से आइसोलेट हो लेंगे? और कहां से परिजन उनसे अलग हो जाएंगे? इस बार तो घरों में पूरा का पूरा परिवार ही बीमार पड़ जा रहा है। ऐसे में लोग क्या क्या करें?

यह जमीनी हकीकत यह है कि यदि कोरोना का कहर मात्र आम आदमी पर ही टूटता तो देश और विदेश में इतना हो-हल्ला भी न होता। पिछले साल बिहार के मुजफ्फरपुर जिले में चमकी बुखार से 100 से अधिक बच्चों की मौत हो गई थी। तब जाकर केंद्र सरकार की आंख खुली थी।

क्या व्यावहारिक हैं आइसोलेट, क्वारंटाइन और सोशल डिस्टिंग जैसे शब्द?

क्या हमारे देश में आइसोलेट, क्वारंटाइन और सोशल डिस्टिंग जैसे शब्द लंबे समय तक व्यावहारिक बने रह सकते हैं? हां, देश में ऐसे भी लोग हैं जो 20 हजार रुपये देकर रेमेडिसविर इंजेक्शन खरीद रहे हैं। प्लाज्मा डोनर को 25 हजार रुपये देकर उससे प्लाज्मा ले रहे हैं। सरकारें इस व्यवस्था पर क्या कर हरी हैं?

या यह कहा जाए कि सरकारें भी इस व्यवस्था का हिस्सा बनकर रह गई हैं। करोना की वजह से समाज में अब चीख-पुकार अधिक मच गई है। निम्न वर्ग और मध्यवर्ग परेशान होकर सिस्टम पर उंगली उठाने लगा है। पिछले साल क्या हुआ? लोग ताली और थाली बजाने में मस्त थे। रामायण और महाभारत में देखने में व्यस्त थे। काफी लोग पर्वतीय क्षेत्रों में चले गये थे।

Corona Havoc: क्या किसी ने आने वाले संकट की ओर देश और समाज को आगाह किया या फिर खुद लोगों ने इस ओर ध्यान आकृष्ट किया? सभी अपने अपने स्वार्थ में मस्त हैं। जब राष्ट्रवाद और देशभक्ति की बात आती है तो बस इनसे बातें करा लीजिए।

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