Skip to content
Primary Menu
  • Home
  • ख़ास ख़बर
  • आलेख
    • सत्ता की सियासत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • राष्ट्रीय
  • दिल्ली एनसीआर
  • राज्यों से …
  • कारोबार
  • साहित्य
  • संस्कार
  • तकनीक
  • मनोरंजन
  • स्वास्थ्य
  • शिक्षा
  • खेल
Logo300

INFOPOST NEWS

The power of information

June 3, 2026

Connect with Us

  • Home
  • ख़ास ख़बर
  • आलेख
    • सत्ता की सियासत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • राष्ट्रीय
  • दिल्ली एनसीआर
  • राज्यों से …
  • कारोबार
  • साहित्य
  • संस्कार
  • तकनीक
  • मनोरंजन
  • स्वास्थ्य
  • शिक्षा
  • खेल

Categories

  • sports
  • Uncategorized
  • अंतरराष्ट्रीय
  • आलेख
  • कारोबार
  • ख़ास ख़बर
  • तकनीक
  • दिल्ली एनसीआर
  • बोलती तस्वीरें
  • मनोरंजन
  • राज्यों से …
  • राष्ट्रीय
  • शिक्षा
  • सत्ता की सियासत
  • संस्कार
  • साहित्य
  • स्वास्थ्य
An error has occurred, which probably means the feed is down. Try again later.

  • आलेख
  • ख़ास ख़बर

farmers law: जमीन लेंगे … और जान भी

October 24, 2020
farmers law

farmers law: संसद में जबरन पारित और राष्ट्रपति द्वारा हस्ताक्षरित दो किसान कानूनों के खिलाफ किसान आंदोलन कर रहे हैं। कांग्रेस समेत कई विपक्षी पार्टियां किसानों के समर्थन और सरकार के विरोध में हैं। मीडिया में भी कुछ बहस चली है। कानूनों के पक्ष-विपक्ष में किसान-समस्या के गंभीर अध्येताओं ने अपने मत रखे हैं। सरकार पूरी तरह कानूनों के पक्ष में अड़ी है। किसान-समस्या कम से कम भारत की मूलभूत समस्या है।

Thank you for reading this post, don't forget to subscribe!

इसे गंभीरतापूर्वक समझे और सुलझाए बिना एक आधुनिक राष्ट्र और समाज के रूप में हम न खड़े हो सकते हैं, न आगे बढ़ सकते हैं। सबसे ज्यादा इस बारे में किसानों और उनके नुमाइंदों को सोचना है। कांग्रेस अगर इन कानूनों के चलते किसानों की पक्षकार बन रही है तो उसे अपने निकट अतीत की नीतियों पर पुनर्विचार कर लेना चाहिए। तभी उसके विरोध की साख और सार्थकता बनेगी। नवउदारवादी दौर की मुक्त बाज़ार(वादी) अर्थव्यवस्था (फ्री मार्किट इकॉनमी) में किसान, खेती और ज़मीन की समस्या पर यह लेख 2009 का है। अब फिर प्रासंगिक है।


farmers law: जमीन की जंग

Prem Singh
प्रेम सिंह

farmers law: खेत, जंगल, नदी-घाटी, पठार, पहाड़, समुद्र के गहरे किनारे – हर जगह जमीन की अंतहीन जंग छिड़ी है। यह जंग जमीन पर बसने और उसे हथियाने वालों के बीच उतनी नहीं है, जितनी जमीन हथियाने वालों के बीच है। जमीन हथियाने वालों में छोटे-बड़े बिल्डिरों से लेकर देशी-विदेशी बहुराष्टीय कंपनियां शामिल हैं।

भारत की सरकारें उनके दलाल की भूमिका निभाती देखी जा सकती हैं। वे बहुराष्टीय कंपनियों के लिए सस्ते दामों पर जमीन का अधिग्रहण करती हैं और प्रतिरोध करने वाले किसानों-आदिवासियों को ठिकाने लगाती हैं।

ठिकाने वे किसानों-आदिवासियों के साथ जुटने वाले जनांदालनकारियों/सरोकारधर्मी नागरिकों को भी लगाती हैं। नवउदारवाद की शुरुआत से ही सभी सरकारें ‘जनहित’ का यह काम तेजी और मुस्तैदी से कर रही हैं।

हम जमीन के अधिग्रहण या खरीदी को हथियाना इसलिए कहते हैं कि देश में लोकतंत्र होने के बावजूद जिनकी जमीन है उन्हें, पहली छोड़िए, बराबर की पार्टी भी नहीं माना जाता। उनसे पूछा तक नहीं जाता। सरकारें जो तय कर देती हैं, वही उन्हें मंजूर करना पड़ता है।

भूमि अधिग्रहण कानून

farmers law: अंग्रेजों ने 1894 में भूमि अधिग्रहण कानून बनाया था जो आज भी चलता है। उस कानून के तहत सरकारें जनहित में किसी भी किसान या गांव की जमीन का अधिग्रहण कर सकती हैं। नवउदारवादी दौर में इस कानून के इस्तेमाल में तेजी आई है। विशेष आर्थिक जोन (सेज) कानून उसी उपनिवेशवादी कानून का विस्तार है।

2005 में बना और 2006 व 2007 में संशोधित हुआ यह कानून एक ‘ट्रेंड सैटर’ है। चीन के 6 विशेष आर्थिक क्षेत्रों का हवाला देते हुए जिस तरह से सेज के नाम पर जमीन की लूट-मार मची (2009 के मध्य तक 578 सेज स्वीकृत हुए हैं), उसे देखकर लगता है भारत में ‘सेज-युग’ आ गया है।

यह हकीकत बहुत बार बताई जा चुकी है कि सेज पूंजीपतियों के मुनाफे के विशेष क्षेत्र हैं जहां भारतीय संविधान और कानून लागू नहीं होते। सेज इस सच्चाई का सीध सबूत हैं कि भारत की सरकारों के लिए जनहित का अर्थ पूंजीपतियों का हित बन गया है।

हमने सेज को ‘टेंड सैटर’ कहा

इसी अर्थ में हमने सेज को ‘टेंड सैटर’ कहा है। तर्क दिया गया है कि सेज को अवंटित जमीन भारत की कुल कृषि योग्य भूमि का एक निहायत छोटा हिस्सा है। सवाल यह नहीं है कि सेज के हवाले की गई जमीन कितनी है, सवाल सरकारों और पूंजीपतियों की नीयत का है। यह नीयत भरने वाली है।

सेज की आलोचना और विरोध करने वाले लोगों की आवाज सरकारों के संवेदनहीन रवैये के आगे मंद पड़ गई है। दरअसल, सरकारों का यह रवैया बन गया है कि पूंजीपतियों के हित का काम कर गुजरो, कुछ दिन हो-हल्ला होगा, फिर विरोध का नया मुद्दा आ जाएगा और पिछला पीछे छूट जाएगा।

farmers law: इसी रवैये के तहत सरकारें पिछले बीस सालों में एक के बाद एक जन-विरोधी देश-विरोधी फैसले लेती और उनके विरोध की अनदेखी करती गई हैं। नवउदारवादी दौर का यह इतिहास पढ़ना चाहें तो वह अभी हिंदी समेत भारतीय भाषाओं के परचों, पुस्तिकाओं और लघु पत्रिकाओं में दर्ज है।

विद्वानों के लेखन का विषय वह अभी नहीं बना है। विद्वानों के सामने शोध के बहुत-से नवउदारवाद-सम्मत विषय हैं, जिनमें एक औपनिवेशिक गुलामी के खिलाफ संघर्ष करने वालों के चरित्र और चिंतन में कीड़े निकालना भी है।

सेज पूंजीवादी साम्राज्यवाद के तरकस से निकला एक और तीर

farmers law: सेज पूंजीवादी साम्राज्यवाद के तरकस से निकला एक और तीर है जिसे देश में पूंजीवादी साम्राज्यवाद के एजेंटों ने भारत माता की छाती बेधने के लिए चलाया है। देश की संप्रभुता और जनता के खून के प्यासे ये एजेंट राजनीति, नौकरशाही, और पूंजीपतियों से लेकर बौद्धिक हलकों तक पैठे हुए हैं। एक ताजा उदाहरण लें।

देश में आलू के बाद उत्पादन में दूसरा स्थान रखने वाले बैंगन को लेकर बहस चल रही थी कि देश में बीटी बैंगन के उत्पादन की स्वीकृति दी जाए या नहीं। देश में कई नागरिक और जनांदोलनकारी संगठन इसका विरोध कर रहे थे। उन्होंने अपना विरोध बड़ी संख्या में नागरिकों के हस्ताक्षरों समेत सरकार के सभी महत्वपूर्ण पदाधिकारियों तक पहुंचा दिया था।

farmers law: आप जानते हैं इससे पहले बीटी कॉटन के उत्पादन की स्वीकृति मिली थी। महाराष्ट्र के विदर्भ इलाके में सबसे ज्यादा किसानों की आत्महत्या के पीछे एक प्रमुख कारण बीटी कॉटन की खेती में लगने वाला घाटा माना गया। उसकी काट के लिए बीज का व्यापार करने वाली बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने इंटरनेशनल फूड पॉलिसी रिसर्च इंस्टीच्यूट (आईएफपीआरआई) नाम का अमेरिकी ‘थिंकटैंक’ भारत भेजा। उसने यह ‘सिद्ध’ किया कि आत्महत्या के कारणों में बीटी बॉटन की खेती का घाटा नहीं है।

कपास इंसान के खाने के काम नहीं आती। अनाज और सब्जियां जेनेटिकली मॉडिफाइड बीजों से उगाना अप्राकृतिक लिहाजा असुरक्षित है। हालांकि, समस्त विरोध के बावजूद मुनाफाखोर कंपनियों के सामने पेश नहीं पड़ती है। क्योंकि देश के कर्णधारों के साथ उनका ‘नेक्सस’ बना हुआ है। इस जानी-मानी सच्चाई की जाने-माने मोलेक्युलर बायोलॉजिस्ट डॉ. पीएम भार्गव ने हाल में एक बार फिर पुष्टि की है।

जेनेटिक इंजीनियरिंग अप्रूवल कमेटी

डॉ. भागर्व जीएम फूड की स्वीकृति के लिए बनी जेनेटिक इंजीनियरिंग अप्रूवल कमेटी (जीईएसी) में सुप्रीम कोर्ट के नुमाइंदे थे। कमेटी ने डॉ. भागर्व के विरोध के बावजूद बीटी बैंगन के उत्पादन की स्वीकृति दे दी है।

डॉ. भागर्व कहते हैं देश के नेताओं, प्रशासकों, वैज्ञानिकों, उद्योगपतियों का बहुराष्टीय कंपनियों के साथ ‘नेक्सस’ बना हुआ है। जीईएसी की स्वीकृति भारत में बैंगन की फसल पर एकाधिकार करने के बहुराष्ट्रीय कंपनियों के षड़यंत्र का नतीजा है। उन्होंने इस स्वीकृति को देश पर आने वाली सबसे बड़ी आपदाओं में माना है।

farmers law: देश के कृषिमंत्री कहते हैं कमेटी का निर्णय अंतिम हैं, सरकार की उसमें कोई भूमिका नहीं है। वन एवं पर्यावरण राज्यमंत्री जयराम रमेश कहते हैं सरकार का यह अधिकार, बल्कि जिम्मेदारी है कि वह जनता की सुरक्षा के मामले में कमेटी की अनुशंसाओं पर अपना स्वतंत्र निर्णय ले। हम जानते हैं सरकार का वह निर्णय कमेटी का निर्णय बदलने वाला नहीं होगा।

होगा वही जो कंपनियां चाहती हैं

इस मामले में होगा वही जो कंपनियां चाहती हैं। मंत्रियों का आपसी विवाद वास्तविक विरोध से ध्यान भटकाने के लिए हो सकता है। हम चाहते हैं ऐसा न हो, लेकिन अभी तक के अनुभव को देखते हुए जयराम रमेश के वक्तव्य के पीछे अपना ‘हिस्सा’ सुनिश्चित करना भी हो सकता है। कृषिमंत्री शरद पवार राष्ट्रवादी कांग्रेस के हैं, जयराम रमेश कांग्रेस के।

भोपाल गैस कांड के अनुभव से हम अच्छी तरह जानते हैं कि डॉ. भार्गव जैसे वैज्ञानिकों/विशेषज्ञों का बाद में पता नहीं चलता। या तो वे सरकार की राय के हो जाते हैं या हटा दिए जाते हैं।

farmers law: भारत माता की छाती पर जमे ये पीपल, जैसा कि हमने मनमोहन सिंह के संदर्भ में पहले कहा है, साम्राज्यवाद की संतान हैं। इनका बीज औपनिवेशिक दौर में पड़ा था जो भूमंडलीकरण के दौर में माकूल खाद-पानी पाकर लहलहा उठा है।

आज यह अतिशयोक्ति लग सकती है, लेकिन जल्दी ही एक दिन ऐसा आ सकता है जब साम्राज्यवाद की ये संतानें कहें कि 1857 तो गलत हुआ ही, 1947 उससे भी ज्यादा गलत हुआ; बीच में विभिन्न धाराओं के स्वतंत्रता सेनानियों द्वारा स्वतंत्रता, स्वराज, समता और स्वावलंबन की पुकार न लगाई होती तो भारत को विकसित और महाशक्ति होने के लिए 2020 तक इंतजार नहीं करना पड़ता।

आपको याद होगा यह तारीख पूर्व ‘वैज्ञानिक’ राष्टपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम ने तय की थी। हालांकि अवकाश प्राप्ति के अवसर पर उन्हें यह तारीख नजदीक खिसकती नजर आई। उन्होंने आतुर भाव से कहा, ‘भारत 2020 से पहले भी महाशक्ति हो सकता है।’

पूंजीपतियों को मालामाल करने वाला कानून

farmers law: सेज की तरफ लौटें। देश के कई भागों में किसानों के प्रतिरोध और सिंगुर और नंदीग्राम में उनकी हत्याओं के बाद जो कुछ नेता ‘किसानों के हित’ में सेज कानून 2005 में कुछ सुधार करने का सुझाव दे रहे थे, वे उस समय भी मौजूद थे जब किसानों को बरबाद और देशी-विदेशी पूंजीपतियों को मालामाल करने वाला यह कानून बना था।

‘सुधारवादियों’ से स्वर मिलाते हुए सोनिया गांधी का कहना कि सेज के लिए खेती की जमीन नहीं दी जानी चाहिए; भारतीय रिजर्व बैंक का बैंकों को यह निर्देश देना कि सेज विकसित करने वाली कंपनियों को उसी आधार पर कर्ज दिया जाए जिस आधार पर रीयल इस्टेट का धंधा करने वालों को दिया जाता है; सेज को ‘टैक्स स्वर्ग’ बनाने के मामले में उस समय के वित्तमंत्री पी चिदंबरम की शुरुआती आपत्ति आदि से सरकार के भीतर तालमेल के अभाव का भले ही पता चलता हो, कानून को लेकर असहमति किसी की नहीं थी।

किसानों के विरोध के बाद जिस तरह से सभी राजनैतिक पार्टियों की ओर से कानून में सुधार और संशोधन की आवाज उठी, उससे एकबारगी लगा गोया यह कानून संसद ने नहीं कंपनियों ने बनाया है!

सेज के लिए कर्ज और टैक्स के लिए क्या नीति हो; बंजर भूमि दी जाए या उपजाऊ; जमीन लेने से पहले किसानों की अनुमति ली जाए या नहीं; मुआवजे की दर और पुनर्वास की नीति क्या हो; प्रभावित किसानों को रोजगार दिया जाए या सहभागिता-ये जो सारे मुद्दे उठाए गए, उन पर जो बहस चली और उनका जो भी समाधान निकला अथवा नहीं निकला, सच्चाई यही रही कि पूंजीवादी-साम्राज्यवादी विकास में किसानों-आदिवासियों को समाप्त होना है। किसानों-आदिवासियों की समाप्ति का मतलब है कारीगरों और छोटे दुकानदारों का भी समाप्त होना।

About Author

See author's posts

Post navigation

Previous: Assembly elections: बिहार में सुशासन का जादू बरकरार
Next: Capital’s amphitheater: पूंजी की रंगभूमि का खेल

Related Stories

Coaching Culture
  • ख़ास ख़बर
  • शिक्षा

Coaching Culture: कोचिंग संस्कृति का बढ़ता दबाव

Shrikant Singh June 3, 2026 0
Digital Education
  • ख़ास ख़बर
  • शिक्षा

Digital Education: डिजिटल एजुकेशन बनाम पारंपरिक मीडिया

Shrikant Singh June 3, 2026 0
Cockroach Leader's Delhi Visit
  • ख़ास ख़बर
  • सत्ता की सियासत

Cockroach Leader’s Delhi Visit: सोशल मीडिया की लोकप्रियता क्या सड़क पर भी दिखेगी?

Shrikant Singh June 2, 2026 0

Copyright © All rights reserved. | MoreNews by AF themes.