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Religious Laws: धार्मिक पर्यटन का उत्साह और सत्ता से मतभेद

infopost January 16, 2024
Religious Laws

Religious Laws: देशभर में राम लला की कहानियां गूंज रही हैं। लोग अयोध्या पहुंचने की तैयारियों में लगे हैं। जाहिर है कि धार्मिक पर्यटन का उत्साह लोगों के सिर चढ़ कर बोल रहा है। लेकिन जब धर्म, शास्त्र और संविधान की बात आती है तो कई जाने माने लोग कुछ अलग ही राय के साथ सामने आते हैं। समझते हैं कि क्या कुछ चल रहा है।

Religious Laws: अनुष्ठान परायण सत्ता से धार्मिक विधि विधान का आग्रह

श्रीकांत सिंह

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Religious Laws: देश के शंकराचार्यों और ज्योतिषियों ने शास्त्रों और धार्मिक ग्रंथों के हवाले से कहा है कि निर्माणाधीन मंदिर में भगवान की प्राण प्रतिष्ठा नहीं की जा सकती। और इसी आधार पर शंकराचार्यों ने 22 जनवरी को प्रस्तावित श्री राम मंदिर के प्राण प्रतिष्ठा कार्यक्रम में अयोध्या जाने से इनकार कर दिया है।

यही वजह है कि शास्त्रज्ञों और सत्ता में ठन गई है। शंकराचार्यों को जहां सोशल मीडिया में ट्रोल किया जा रहा है वहीं सत्ता पक्ष के लोग शंकराचार्यों की भूमिका पर ही सवाल उठा रहे हैं। केंद्रीय मंत्री नारायण राणे ने तो सवाल उठा दिया है कि राम मंदिर आंदोलन में शंकराचार्यों की भूमिका ही क्या रही है? इसके विरोध में भी सवाल उठाए जा रहे हैं राम मंदिर का निर्माण माननीय सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद संभव हो पा रहा है। एक शंकराचार्य ने तो सुप्रीम कोर्ट में मंदिर के समर्थन में पक्ष भी रखा था। लेकिन इसमें सरकार की क्या भूमिका है? सत्ता पक्ष तो चुनावी लाभ के लिए शास्त्र विरुद्ध कार्य कर रहा है।

प्राण प्रतिष्ठा के लिए 11 दिन के अनुष्ठान पर सवाल

Religious Laws:  बावजूद इसके, पीएम मोदी ने प्राण प्रतिष्ठा के लिए 11 दिन के अनुष्ठान की घोषणा की है। जबकि धर्माचार्य कह रहे हैं कि किसी फल की इच्छा से किया गया अनुष्ठान लोकोपकारी नहीं हो सकता। भगवान आसक्ति से नहीं, विरक्ति से प्रसन्न होते हैं। क्योंकि सामान्य जीवन से श्रेष्ठ अनुष्ठान हो सकता है, लेकिन उससे श्रेष्ठ ध्यान होता है और ध्यान से भी श्रेष्ठ विरक्ति। प्राण प्रतिष्ठा में जल्दबाजी विरक्ति नहीं चुनावी लाभ के लिए आसक्ति का परिणाम है।

विपक्ष भी सत्ता पक्ष पर सवाल उठाने से नहीं चूक रहा है। यही वजह है कि भगवान प्रेमी और शंकराचार्य पद की अपनी अपनी सुविधा के अनुसार व्याख्या की जा रही है। एक दूसरे को राम और मंदिर विरोधी बताने के लिए तर्क गढ़े जा रहे हैं। कांग्रेस नेता मणिशंकर अय्यर ने कहा है कि पीएम मोदी अयोध्या में राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा कार्यक्रम को निजीतौर पर करा रहे हैं। इसमें चारों शंकराचार्य नहीं आ रहे हैं। उनकी अनुपस्थिति पीएम मोदी पर बहुत भारी पड़ेगी।

चंपत राय ने कहा, ‘वो भगवान व‍िष्‍णु का अवतार’

राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को भगवान विष्णु का अवतार बताया है। एक न्यूज चैनल से बात करते हुए उन्होंने स्पष्ट किया कि भारतीय परंपरा में राजा भगवान विष्णु का ही स्वरूप होता है। लेकिन मोदी जी राजा हैं या प्रधान सेवक? इस पर भी विचार किए जाने की जरूरत है। चंपत ने राम मंदिर और राष्ट्र मंदिर निर्माण का श्रेय मोदी जी को देते हुए कहा था कि वह अति मानवीय और दिव्य योग्यताओं से युक्त हैं।

चंपत राय के इस बयान को व्यक्ति पूजा से जोड़ा जा रहा है। क्योंकि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ हमेशा व्यक्ति पूजा के खिलाफ रहा है। तभी तो आरएसएस ने भगवा ध्वज को गुरु माना है। संघ का मत है कि जीव में विकार आने की पूरी आशंका होती है। इसलिए उसे गुरु नहीं बनाया जा सकता। भगवा ध्वज ही गुरु बनने के योग्य होता है, क्योंकि वह त्याग और अग्नि का प्रतीक है। संघ की शाखाओं में भी भगवाध्वज को ही प्रणाम किया जाता है।

राजनीतिक हिंदुत्व बनाम शास्त्रीय हिंदुत्व

Religious Laws:  अयोध्या में 22 जनवरी को प्रस्तावित निर्माणाधीन श्री राम मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा से पहले राजनीतिक हिंदुत्व और शास्त्रीय हिंदुत्व को लेकर विमर्श शुरू हो गया है। ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने एक साक्षात्कार में कहा है कि असल में इस समय दो तरह का हिंदुत्व समझा जा रहा है। एक वह हिंदू है जो धर्म को अपने जीवन में जी रहा है और दूसरा हिंदू वह है जो राजनीतिक रूप से अपने को एकजुट पा रहा है। सरल शब्दों में कहा जाए तो एक राजनीतिक हिंदू है और दूसरा धार्मिक हिंदू।

सरकार के समर्थन में दो प्रकार के लोग हैं। एक वे जो हिंदुत्व समर्थक सरकार की छत्रछाया में ही खुद को सुरक्षित महसूस कर रहे हैं और दूसरे प्रकार के वे लोग हैं जो हिंदुत्व के नाम पर सत्ता में बने रहना चाहते हैं। इस प्रकार हिंदुत्व दो समूहों में बंट गया है। क्योंकि राजनीति का नियम है कि बांटो और राज करो। लेकिन हम लोग शास्त्रजीवी हैं और सनातनी कहे जाते हैं। जो चीजें आंख से नहीं दिखतीं, उन्हें शास्त्र हमें दिखाते हैं। इस श्रेणी में देवता और भगवान आते हैं। इसलिए भगवान के बारे में कुछ भी कहने की क्षमता हमारे शास्त्रों में निहित है। और शास्त्रों के अनुसार अपूर्ण मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा उचित नहीं होती। उससे प्रतिकूल परिणाम सामने आते हैं। यहां तक कि उससे राजा का सिंहासन भी छिन सकता है। और मैं नहीं चाहता कि ऐसा हो। इसीलिए शास्त्रों में विहित विधिविधान के अनुसार भगवान राम की प्राण प्रतिष्ठा किए जाने का आग्रह कर रहा हूं।

दिल में ही की जा सकती है प्रभु श्री राम की प्रतिष्ठा

Religious Laws:  सुप्रसिद्ध हास्य कवि पद्मश्री सुरेंद्र शर्मा ने कहा है कि धर्म को कंधे पर बैठा कर राजनीति की जानी चाहिए, न कि धर्म के कंधे पर बैठ कर राजनीति की जाए। एक व्यक्ति था जिसने जीवन भर भगवान का नाम नहीं लिया। इसलिए पूरा शहर उसे नास्तिक कहता था। एक दिन उसकी पत्नी ने उससे कहा कि आज रात सपने में तुम्हारे मुंह से राम शब्द निकल गया। अब तुम क्या करोगे? इस पर उसने कहा, जिसे मैंने अपने दिल में बसा रखा था वह मुंह से बाहर निकल गया तो मेरे जीने का कोई मतलब नहीं है। मतलब साफ है कि शोर मचा कर राम को नहीं पाया जा सकता। उनकी प्रतिष्ठा दिल में की जा सकती है।

उन्होंने एक और दिलचस्प बात कही। किसी ने उनसे कहा कि तराजू के एक पलड़े में राम हों और दूसरे पलड़े में तुम हो। कौन सा पलड़ा भारी होगा? इस पर सुरेंद्र शर्मा ने कहा कि जिस पलड़े में मैं हूं, वही भारी होगा। क्योंकि जिस पलड़े में मैं हूं, उसमें मेरे दिल में स्थित राम भी हैं। दोनों को मिला कर मेरा ही पलड़ा भारी रहेगा। इसी प्रकार एक व्यक्ति ने उन्हें ताली बजाने और भजन गाने को कहा। लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। उसने कारण पूछा तो उन्होंने कहा कि तुम भजन गाने को कहते हो। लेकिन मैं मनन करता हूं। भजन गाने से राम शब्द मेरे मुंह से बाहर निकल जाता है। लेकिन मनन के जरिये मैं राम को अपने अंदर ले जाता हूं। भजन गाकर उन्हें अपने अंदर से बाहर नहीं निकालना चाहता।

जाहिर सी बात है कि राम तत्व को समझे बिना उनका कोई भी अनुष्ठान सफल नहीं होता। गीता में भी यही बात कही गई है कि हमारा अधिकार कर्म करने में है न कि फल में। यदि चुनाव जीतने की इच्छा से आधे अधूरे राम मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा की जा रही है तो उस इच्छा के पूरा होने में संदेह बना ही रहेगा। यह देखने वाली बात होगी कि प्राण प्रतिष्ठा के जरिये भाजपा और उसके सुप्रीमो पीएम मोदी की चुनावी नैया पार होती है या नहीं। इस संदर्भ में आपको क्या लगता है? कमेंट करके जरूर बताएं।

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