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Tribute to Ram Vilas Paswan: बिहार चुनाव से पहले पासवान का चले जाना…

October 9, 2020
Tribute to Ram Vilas Paswan

Tribute to Ram Vilas Paswan: जन जन का चहेता दलित नेता। जनता को समझने वाला। हमेशा आगे की सोचने वाला। विरोधियों का भी प्रिय नेता। ये सब लोकप्रिय नेता रामविलास पासवान की कुछ खासियतें हैं। जिनकी वजह से वह देश के छह प्रधानमंत्रियों के साथ काम कर सके। उनके निधन से देश की राजनीति का बड़ा नुकसान हुआ है।

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Tribute to Ram Vilas Paswan: दलित राजनीति के मसीहा रामविलास पासवान का 74 वर्ष की उम्र में निधन

Tribute to Ram Vilas Paswan

श्रीकांत सिंह


लोजपा संस्थापक रामविलास पासवान लंबे समय से बीमार चल रहे थे। और अंततः बिहार विधानसभा चुनाव में प्रचार से पहले ही उनका निधन हो गया। अपनी बीमारी को को ध्यान में रख कर उन्होंने पार्टी की पूरी जिम्मेदारी चिराग पासवान को दे दी थी। उन्हें पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष भी बना दिया था।

लोकतंत्र सेनानी कल्याण समिति के संरक्षक व विधान परिषद सदस्य यशवंत सिंह ने केंद्रीय मंत्री राम विलास पासवान के निधन पर गहरी संवेदना व्यक्त की है।

दलित राजनीति के मसीहा रामविलास पासवान के निधन (Tribute to Ram Vilas Paswan) के बाद अब बड़ा सवाल है कि बिहार विधानसभा चुनाव के नतीजों पर वरिष्ठ दलित नेता के निधन का क्या प्रभाव पड़ेगा। चिराग पासवान के नेतृत्व में लोजपा एनडीए से बाहर का रास्ता तय कर चुकी है।

पासवान के निधन का बिहार के चुनाव पर क्या होगा असर ?

इन परिस्थितियों में रामविलास पासवान के निधन का क्या असर परिणाम पर पड़ेगा? जानकार बताते हैं कि रामविलास पासवान के जाने के बाद पासवान जाति के लोग एकजुट होकर लोजपा के पक्ष में वोट कर सकते हैं।

करीब 1 माह पहले चिराग पासवान ने अपने पिता की बीमारी का जिक्र करते हुए अपने समर्थकों को राजनीतिक तौर पर सक्रिय होने का आह्वान किया था। एक सवाल जो लोगों के जेहन में है, वह यह कि क्या राष्ट्रीय स्तर पर रामविलास पासवान के बेटे चिराग पासवान बिहार में पांच स्थानों के वोट को एक रख पाएंगे। चिराग पासवान इसी कोशिश में लगे हुए हैं।

पूर्व केंद्रीय मंत्री और भाजपा एमएलसी संजय पासवान के मुताबिक, चिराग पासवान के लिए अपने पिता की विरासत को बनाए रखना एक बड़ी चुनौती होगी। रामविलास पासवान जैसे बड़े नेता का यूं चले जाना किसी भी पार्टी के लिए बड़ी चुनौती होती है।

चिराग के लिए एक बड़ी परीक्षा होगी

रामविलास को जिस तरह का जनाधार और लोकप्रियता हासिल थी, वह उनके समर्थकों को चौंका देने वाली थी। चिराग के लिए अपने पिता की विरासत और पार्टी को प्रासंगिक बनाए रखना एक बड़ी परीक्षा होगी।

रामविलास पासवान ने खराब सेहत के कारण 2019 में चिराग पासवान को लोजपा का राष्ट्रीय अध्यक्ष बना दिया था। बाद में चिराग के चचेरे भाई और पूर्व सांसद रामचंद्र पासवान के बेटे प्रिंस राज को ‘बिहार फर्स्ट बिहारी फर्स्ट’ स्लोगन के साथ प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया।

चिराग पासवान को लोजपा की ओर से भावी मुख्यमंत्री उम्मीदवार के रूप में देखा जाने लगा और इस युवा नेता ने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को अपने निशाने पर ले लिया। राजद नेता श्याम रजक, जो कुछ महीने पहले तक नीतीश कैबिनेट में मंत्री थे, ने कहा कि रामविलास पासवान सिर्फ बिहार ही नहीं, बल्कि राष्ट्रीय राजनीति में अपनी पार्टी की पहचान बनाई।

नीतीश कुमार से नाराजगी की वजहें

लोजपा प्रमुख चिराग पासवान ने 24 सितंबर को बीजेपी अध्यक्ष जे पी नड्डा को एक पत्र लिखा था। पत्र में कहा गया था कि नीतीश कुमार को लेकर बिहार की जनता में आक्रोश है और ये बात बीजेपी के सर्वे में भी सामने आई है।

इसके साथ ही नीतीश कुमार से नाराजगी की कई वजहें बताईं। रामविलास पासवान के राज्यसभा के नामांकन के समय नीतीश कुमार का साथ आने में आना कानी करने का जिक्र किया। इसके साथ ही ये भी लिखा कि जब सरकार में लोजपा का मंत्री शामिल करने की बात आई तब नीतीश ने कहा था कि आप लोग ब्राह्मण-ठाकुर के चक्कर में नहीं पड़ें, परिवार का कोई हो तो बताएं।

चिट्ठी में यहां तक कहा गया कि अगर नीतीश कुमार के नेतृत्व में चुनाव हुआ तो एनडीए की हार होगी। इसलिए भाजपा को अपना मुख्यमंत्री उम्मीदवार खड़ा करना चाहिए। चिराग पासवान ने अपने पत्र में यह भी दावा किया कि भाजपा के कई नेता नीतीश कुमार के कामकाज से नाखुश हैं और पीएम नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता जहां बढ़ रही है वहीं मुख्यमंत्री की घट रही है।

सभी के चहेते बने रहे रामविलास पासवान

दरअसल, रामविलास पासवान एक ऐसे नेता रहे हैं, जो कई राजनीतिक दलों, अधिकारियों और आम जनता के चहेते थे। उन्हें जनता की नब्ज को समझने में महारत हासिल थी। अपने 51 साल के राजनीतिक सफर में वह नेताओं और लोगों के चहेते ही बने रहे। ऐसा दलित नेता एक लंबे अंतराल के बाद ही पैदा होता है। इसलिए उनके निधन से राजनीति की बड़ी क्षति हुई है।

केंद्रीय मंत्री रामविलास पासवान का गुरुवार को निधन हो गया। वह 74 वर्ष के थे। पासवान ने जेपी आंदोलन में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया था। उस दौरान आपातकाल का विरोध करने के कारण उन्हें जेल भी जाना पड़ा था।

दिवंगत केंद्रीय मंत्री रामविलास पासवान के पार्थिव शरीर को एयरपोर्ट से लोक जनशक्ति पार्टी के प्रदेश कार्यालय में अंतिम दर्शन के लिए रखा जाएगा। उनका अंतिम संस्कार शनिवार को किया जाएगा। पासवान को उनकी तमाम खूबियों के लिए याद किया जाएगा।

नेता वही, जो 10 साल आगे की सोचे

रामविलास पासवान अक्सर कहते थे कि नेता वही है, जो 10 साल आगे की सोचता है। 1989 के बाद से नरसिंह राव और मनमोहन सिंह की दूसरी यूपीए सरकार को छोड़ दें तो वह हर प्रधानमंत्री की सरकार में मंत्री रहे। UPA, NDA और तीसरे मोर्चे की सरकार में भी उन्हें मंत्री बनाया गया।

पासवान राष्ट्रीय स्तर पर दलित राजनीति के सबसे बड़े चेहरे थे। वे दलितों को संविधान और कानून में दिए गए अधिकारों की रक्षा के लिए हमेशा खड़े रहते थे। पासवान ने दलितों, पिछड़ों और अल्पसंख्यकों के उत्थान के लिए आजीवन कार्य किया।

कुशलता से संबंधों को मजबूती दी

राजनीतिक मतभेदों के बावजूद हर पार्टी के नेताओं से उनके व्यक्तिगत संबंध अच्‍छे रहे और उन्होंने कुशलता से इसे मजबूती दी। उनका जन्म बिहार के खगरिया जिले के शाहरबन्नी गांव में हुआ। वह एक अनुसूचित जाति परिवार में पैदा हुए थे।

उन्होंने 1960 के दशक में राजकुमारी देवी से शादी की। 2014 में उन्होंने खुलासा किया कि लोकसभा नामांकन पत्रों को चुनौती देने के बाद उन्होंने 1981 में उन्हें तलाक दे दिया था। उनकी पहली पत्नी राजकुमारी से उषा और आशा दो बेटियां हैं।

1983 में, अमृतसर से एक एयरहोस्टेस और पंजाबी हिन्दू रीना शर्मा से विवाह किया। उनके पास एक बेटा और बेटी है। उनके बेटे चिराग पासवान एक अभिनेता से राजनेता बने हैं।

पिछले 32 वर्षों में 11 चुनाव लड़े, नौ में दर्ज की जीत

श्री पासवान पिछले 32 वर्षों में 11 चुनाव लड़ चुके हैं। उनमें से नौ जीत चुके हैं। इस बार उन्होंने चुनाव नहीं लड़ा लेकिन सत्रहवीं लोकसभा में उन्होंने मोदी सरकार में एक बार फिर से उपभोक्ता मामलात मंत्री पद संभाला।

पासवान के पास छह प्रधानमंत्रियों के साथ काम करने का अनूठा रिकॉर्ड है। पहले वीपी सिंह, दूसरे एचडी देवेगौड़ा, तीसरे इंद्र कुमार गुजराल, चौथे अटल बिहारी वाजपेयी पांचवें मनमोहन सिंह और छठवें नरेंद्र मोदी।

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