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Yogendra Yadav: मोदी के सात साल और असफलताएं बेमिसाल

June 13, 2021
Yogendra Yadav

Yogendra Yadav: जाने माने चुनाव विश्लेषक, राजनीतिक विश्लेषक और आंदोलनजीवी योगेंद्र यादव ने पीएम मोदी के सात साल के शासन पर एक साक्षात्कार में बेबाक टिप्पणी की है। वह मानते हैं कि खेती कानून की मौत हो चुकी है। बस डेथ सर्टिफिकेट जारी होना बाकी है। उन्होंने और क्या कहा, यही बताने के लिए तैयार किया गया है यह पूरा आलेख।

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Yogendra Yadav: तीन आपदाओं में सर्वथा अनुपस्थित रही सरकार

इंफोपोस्ट न्यूज


Yogendra Yadav: पीएम मोदी के सात साल के शासन में तीन आपदाओं कोरोना, अर्थव्यवस्था और चीन से निपटने में सरकार सर्वथा अनुपस्थित रही। लेकिन मीडिया ने असफलताओं को सफलता के रूप में दिखा दिया। फिर भी यह सच है कि मोदी जी की लोकप्रियता में कमी आई है, लेकिन देश के पास पुख्ता विकल्प नहीं है। इसलिए विकल्प तैयार करने में संदेश देने वाली मशीनरी तैयार करनी होगी।

कोविड की दूसरी लहर में केंद्र सरकार की असफलता खुलकर सामने आई। गंगा में बहती लाशें उसी का प्रतीक बन चुकी हैं। सरकार ने अगर निकम्मेपन का परिचय दिया है तो विपक्ष की भी अक्षमता सामने आई है। और सरकार तरह तरह के हथकंडे अपना कर अपना अस्तित्व बचाए हुए है। इसलिए विकल्प की तलाश में देश की संपूर्ण जनता को प्रयास करने होंगे।

डटकर सरकार की दोषपूर्ण नीतियों का करना होगा विरोध

Yogendra Yadav: अगर कोई विकल्प बनना चाहता है तो उसे बिना डरे डटकर सरकार की दोषपूर्ण नीतियों का विरोध करना होगा। ऐसे व्यक्ति का मैं खुद एक सिपाही बनना चाहूंगा। क्योंकि दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल और बंगाल की सीएम ममता बनर्जी ने बिना डरे डट कर मोदी का मुकाबला किया है। बंगाल की हार के बाद बीजेपी की बौखलाहट से पता चलता है कि ममता का कद कहां पहुंच गया है।

मीडिया में किसी की अनुपस्थिति का यह मतलब नहीं है कि वह व्यक्ति काम नहीं कर रहा है। हो सकता है कि वह उस समय अधिक काम कर रहा हो। लेकिन मीडिया की बाजीगरी और मोदी का तिलिस्म टूट रहा है। शायद यही वजह है कि अब लोग उनके वादों और आश्वासनों पर भरोसा नहीं कर पा रहे हैं।

राष्ट्रीय स्तर पर कोई विकल्प नजर नहीं आता

Yogendra Yadav: लोग मोदी जी की नाकामियों पर गुस्सा होते हैं, विकल्प की राह देखते हैं और उनसे किनारा कर लेने की सोचते हैं। फिर भी उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर कोई विकल्प नजर नहीं आता। ऐसे में मोदी जी से निराश हो चुके लोग भी उन्हें वोट दे देते हैं। लेकिन राज्यों के स्तर पर विकल्प निकल कर सामने आ रहे हैं। क्योंकि केजरीवाल और ममता ने विकल्प बनकर ही दिखाया है।

इसलिए राष्ट्रीय स्तर पर मोदी जी का विकल्प उन्हें कोसने से नहीं, एक सार्थक एजेंडा देश के सामने रखने से बनेगा। उसके लिए एक मूल्यवान संदेश देश की जनता तक पहुंचाना होगा। संदेशवाहक भी ऐसा होना चाहिए जो लोगों को अपनी बात ठीक से कम्यूनीकेट कर सके। इसके अलावा एक सांगठनिक मशीनरी भी तैयार करनी होगी जो लोगों में विकल्प के प्रति भरोसा पैदा कर सके।

अर्थव्यवस्था को संभालना इस सरकार के वश में नहीं

Yogendra Yadav: अब लोग मान चुके हैं कि देश की इतनी विशाल अर्थव्यवस्था को संभालना इस सरकार के वश में नहीं है। तुगलकी फैसलों की वजह से अर्थशास्त्रियों का विश्वास सरकार से उठ रहा है। कोविड की दूसरी लहर के दौरान केंद्र सरकार की भूमिका को देख कर सामान्य जन का भी विश्वास सरकार से उठ रहा है। और अब वे विकल्प की तलाश करने लगे हैं। उन्हें विकल्प तभी मिल पाएगा जब एक मेसेज हो, मेसेंजर हो और हो मेसेज पहुंचाने की मजबूत मशीनरी।

आने वाले विधानसभा चुनावों के संदर्भ में उन्होंने कहा कि गंगा में बहती लाशों और सरकार की निर्दयता को देख कर भी उत्तर प्रदेश भाजपा के हाथ से न फिसला तो लोगों का लोकतंत्र से भी भरोसा उठ जाएगा। अगर उत्तर प्रदेश में भाजपा चुनाव हारती है तो एक राष्ट्रीय विकल्प निकल कर सामने आ सकता है। इसलिए लोगों को अब ऐसी नीतियों की जरूरत है जिस पर वे भरोसा कर सकें।

सरकार निकम्मी है तो विपक्ष अकर्मण्य

इस देश में अगर सरकार निकम्मी है तो विपक्ष ने भी अपनी अकर्मण्यता दिखाई है। राष्ट्रीय स्तर पर विपक्ष ने मोदी जी को कोसने के अलावा और कोई सार्थक काम करके नहीं दिखाया है। अगर विपक्ष ने कुछ सार्थक न किया और मौके का इंतजार करता रहा तो चुनाव में मोदी जी का कोई न कोई हथकंडा जरूर काम कर जाएगा।

भाजपा के अपराजेय होने के जो मिथक बनाए जा रहे थे, उसे बंगाल के विधानसभा चुनाव परिणाम ने धराशाई कर दिया है। लेकिन आप यह भी उम्मीद नहीं कर सकते कि ममता के रूप में देश को कोई राष्ट्रीय विकल्प मिल गया है। क्योंकि सरकार चलाने के मामले में ममता ने कोई नया मॉडल अभी तक नहीं दिया है।

बंगाल में भारतीय जनता पार्टी का घमंड टूटा

जहां तक बंगाल में भाजपा की हार का सवाल है, तो यह अधिक महत्वपूर्ण इसलिए लगती है, क्योंकि भाजपा ने दावे कुछ ज्यादा ही कर दिए थे। उससे भी कहीं अधिक महत्वपूर्ण यह है कि बंगाल में भारतीय जनता पार्टी का घमंड टूटा है। लेकिन भाजपा को जितनी सीटें मिली हैं, उससे साबित होता है कि भाजपा बंगाल चुनाव में काफी हद तक ध्रुवीकरण कर पाई है। इस ध्रुवीकरण को न रोका गया तो देश के लिए इससे अधिक दुर्भाग्यपूर्ण और कुछ हो ही नहीं सकता।

किसान आंदोलन के बारे में उन्होंने समझाया कि समाचार टीवी की स्क्रीन अथवा अखबार की हेडलाइन से जो चीज उतर जाती है, उसके बारे में यही लगता है कि वह चीज है ही नहीं। यह सच है कि कटाई के सीजन में आंदोलनकारी किसान गांव चले गए थे और कोरोना के डर से लौटने में विलंब कर दिया।

किसान लौट आए हैं तो उसे मीडिया नहीं दिखा रहा

लेकिन जब लोग गांव लौट रहे थे तो उसे मीडिया ने कवर किया और अब आंदोलनकारी किसान लौट आए हैं तो उसे मीडिया नहीं दिखा रहा है। इसी से किसी को लग सकता है कि किसान आंदोलन फेडआउट हो गया है। आज किसी भी बॉर्डर पर जाकर देखा जाए तो पता चलेगा कि कितने किसान आंदोलन के लिए वापस आ चुके हैं।

फिर भी किसान आंदोलन की मजबूती को बार्डर पर किसानों की संख्या के रूप नहीं देखा जाना चाहिए। यह देखना जरूरी है कि जो भी किसान दिल्ली की सीमाओं पर धरना दे रहे हैं, उनके पीछे कितने लोग हैं। कितना जनसमर्थन और सहानुभूति उनके साथ है। यह आंदोलन मीडिया अथवा सरकार की सुर्खी बने न बने, लेकिन जैसे जैसे दिन बीतता जा रहा है, आंदोलन दिनोंदिन गहरा होता जा रहा है।

आंदोलन सरकार की परेशानी का सबब

ऐसा पहली बार हुआ है कि देश भर के ऐसे ऐसे किसान संगठन एकजुट हुए हैं, जिनके नाम तक लोगों को नहीं मालूम थे। आंदोलन सरकार की परेशानी का सबब इसलिए बना है कि सरकार ने जिस आंदोलन को दबाने की कोशिश की, वह बजाय दबने के फैल गया है। महत्वपूर्ण यह है कि आंदोलन लोगों के मन में बैठ गया है, जिससे सरकार चिंतित भी है।

मामला सुप्रीम कोर्ट में ले जाने को उन्होंने सरकार का दिखावा करार दिया। क्योंकि सुप्रीम कोर्ट के अधिकार क्षेत्र में सिर्फ इतनी बात है कि वह तय करे कि तीनों खेती कानून संवैधानिक हैं अथवा नहीं। अब कानून किसानों के हित में हैं या नहीं, यह तय करना सुप्रीम कोर्ट का काम नहीं है।

किसान आंदोलन से केंद्र और हरियाणा सरकार में घबराहट

सच तो यह है कि किसान आंदोलन से केंद्र और हरियाणा सरकार बुरी तरह घबरायी हुई है। लेकिन इस घबराहट को दिखावे करके छिपाया जा रहा है। इसलिए सतह पर यही लगता है कि सरकार को किसान आंदोलन की कोई परवाह ही नहीं है।

और यह भी कोई अतिशयोक्ति नहीं है कि तीनों खेती कानून मर चुके हैं। इस सरकार या भविष्य में आने वाली किसी दूसरी सरकार की यह हिम्मत नहीं होगी कि तीनों खेती कानूनों को लागू कर सके। फिर भी सरकार खेती कानूनों की मौत का डेथ सर्टिफिकेट देने में संकोच कर रही है।

किसान आंदोलन से तीन महत्वपूर्ण उपलब्धियां हासिल

किसान आंदोलन ने तीन महत्वपूर्ण उपलब्धियां हासिल की है। पहली यह कि किसानों का खोया हुआ आत्मसम्मान लौटा है। तभी तो किसान सिर उठा कर कहता है, मैं किसान हूं। दूसरी यह कि इस किसान आंदोलन ने किसान की राजनैतिक हैसियत का एहसास कराया है। यह बात सभी नेताओं को समझ आ गई है कि कुछ भी करना लेकिन कभी किसान से पंगा न लेना। और तीसरी अंतिम उपलब्धि यह कि किसानों में जो एकता आई है वह अभूतपूर्व है।

अब काम सिर्फ इतना बचा है कि तीनों खेती कानूनों का डेथ सर्टिफिकेट लेना है और एमएसपी पर कुछ हासिल करना है। इन आरोपों को उन्होंने खारिज किया कि किसान नेता कुछ राजनीतिक उपलब्धि भी चाहते हैं। उन्होंने कहा कि किसान आंदोलन का राजनीति से कोई मुख्य सरोकार नहीं है। जिसे राजनीति करनी होगी, वह अपनी पार्टी के माध्यम से करेगा।

सरकार संविधान की बात सुनती नहीं

इसे और स्पष्ट करते हुए उन्होंने कहा कि किसान आंदोलन के दौर में सरकार ने हमें समझा दिया था कि यह सरकार संविधान की बात सुनती नहीं। सरकार से अगर कहा जाए कि तीनों खेती कानून असंवैधानिक हैं तो सरकार कहती है कि हमारे पास बहुमत है। हम तय करेंगे कि क्या संवैधानिक है और क्या असंवैधानिक।

यह सरकार अर्थशास्त्र की बात नहीं समझती। अगर आप कहिए कि खेती कानून किसान विरोधी हैं तो सरकार कहती है, अगर खेती कानून किसान विरोधी हैं तो हमें किसानों का वोट क्यों मिलता है। और ये सरकार इंसानियत की भाषा भी नहीं समझती है। अगर हम कहेंगे कि हमारे 470 साथी शहीद हो गए तो सरकार कहती है, हम तो गुजरात का भी चुनाव जीते हैं।

वोट, चुनाव और सत्ता की ही भाषा समझती है सरकार

तो किसानों को यह समझ में आ गया कि सरकार वोट, चुनाव और सत्ता की ही भाषा समझती है। इसीलिए आंदोलनकारी किसानों ने तय किया कि सरकार को इसी भाषा में समझाया जाएगा। और किसान नेता बंगाल गए और लोगों से अनुरोध किया कि इस किसान विरोधी सरकार को सजा दीजिए। ताकि आगे कोई भी किसान​ विरोधी फैसले करने की हिम्मत न कर सके। और बंगाल के मतदाताओं ने सजा दे दी।

और अगर सरकार का रवैया नहीं बदला तो आने वाले चुनावों में भी किसान नेता भाजपा को हराने की अपील मतदाताओं से करेंगे। उत्तर प्रदेश पर विशेष ध्यान दिया जाएगा। आने वाले समय में देश के उन किसान संगठनों को भी संयुक्त किसान मोर्चे की गतिविधियों में शामिल किया जाएगा, जिनकी उपस्थिति दिल्ली की सीमाओं पर नहीं है।

Yogendra Yadav: हमें भरोसा है कि मोदी जी के आशीर्वाद और उनकी बेहयाई से किसान एकता एक नया मुकाम जरूर हासिल करेगी। इस संदर्भ में आप क्या सोचते हैं, कमेंट सेक्शन में बता सकते हैं।

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